Tuesday, 15 June 2021

शहर

ये शहर अब हमें रास नहीं आता , हर चेहरे एक मुखौटा पहने है , सच कहें तो यहां सांस नहीं आता ।

ईर्ष्या ,कपट, धोखे  के ज़हर मनों में पलते हुए हवा में घुलने लगे ।
कपड़ों के रंग बदलते बदलते यहां  चरित्र बदलने लगे और हैवानियत के गुण अब इंसानों में भी मिलने लगे । 
इस ज़हरीली हवा का बसंत भी  कुछ खास नहीं आता
बुरा ना मानो लेकिन ये शहर अब हमें रास नहीं आता। 

सुकून की तलाश तो बस  एक छलावा मात्र लगती है।
आलीशान महलों की दीवारें  यहां हर रोज सिसकती है।
हजारों  सपने  हर रात दम तोड़ते नजर आते है तो कितने ही अपने यहां हर  सुबह घर छोड़ते नजर आते है।
पूनम की रात का चांद भी  यहां चमक नहीं पाता 
बुरा ना मानो लेकिन ये शहर अब हमें रास नहीं आता।

समुन्द्र का पानी भी मीठा लगने लगे ऐसा दौर यहां आया है। मन्न की कठोरता को जुबां का मीठापन भी कहां छुपा पाया है।
पत्थरों से कठोरता का ज्ञान तो सभी ने ले लिया लेकिन पहाड़ों सा ठहराव कहां  किसी को समझ आया है।
तराशे खुद को हम  ऐसा मौसम यहां नहीं आता ,
बुरा ना मानो लेकिन ये शहर अब हमें रास नहीं आता।

उड़ान की बात करने वाले अक्सर पिंजरे खरीदते पाए
परिंदे ना तो उड़ सके और ना ही कैदी कहलाए ।
खुले आसमान का सच सिर्फ एक बाज़ ने पहचना,
गौरैया को  तो बस दाना चुग घोसले में था उड़ जाना।
एक परिंदा  भी यहां आजादी से उड़ नहीं पाता
बुरा ना मानो लेकिन ये शहर अब  हमें रास नहीं आता ।

सांसे हमारी विराम होने से पहले वीरान पहाड़ों पर आजाद हो लेना चाहती है, 
उस हवा का कुछ हिस्सा इन सांसों के नाम भी बाकी है। सुना है वहां रात खुद ईश्वर की कशीदाकारी और सुबह बड़ी ही तलबगारी होती है।
परिंदा बन उड़ जाऊं उस निर्जन बर्फीले स्थान पर जहां मेरे शंभू का है वासा ।
बुरा ना मानो लेकिन ये शहर अब हमें रास नहीं आता ।

  

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