Sunday, 22 September 2019

रिश्ते

आज कल कुछ यूं चल रहा है जिंदगी का दौर
सुबह कहीं ,दिन कहीं और शामे कहीं ओर
कुछ पराए हो कर भी अपनों से बढ़ के हो गए
और कुछ अपने  परायो की भीड़ में खो गए
लेना और देना तो क्या ही था साहब
मीठे बोल किसका क्या ले गए।

इज्जत के बदले इज्जत प्यार के बदले प्यार इसी नई सोच ने रिश्तों की पुरानी इमारतों को भी ढाया है।
गर्मियों में ननिहाल जाने की बाते हुए पुरानी अब तो समर वेकेशन में  hill station ghumne ka jamana आया है।

कुछ हालात का शिकार हुए तो कुछ गलतफहमी की आंधी में उड़ गए ।
रिश्ते जो कभी कई थे अपने अपने रास्तों पर मुड गए। इसे नए फ़ैशन का दौर समझे या रिश्तों की टूटती हुई डोर।
अपने सब मतलबी हवा में बह गए और रिश्तों  के  बस कुछ नाम रह गए।

कोई पीठ पीछे प्यार से आपका नाम ले
यही है ज़िन्दगी भर की कमाई बाकी चीज़े तो मैं पहचान ही ना पाई।
जिन्होंने मुझे समझा उनके लिए अनमोल हो गई जो ना समझ पाए उनके लिए फ़िज़ूल कहलाई
बस यूंही मिले  कुछ अनजान चेहरे ऐसे भी
जो है ज़रा खास कुछ ना होकर भी।

इन बेमतलब के रिश्तों में कुछ खास नहीं था
ना उम्मीद ना एहसास बस मुस्कुराहट का एक वादा था
वादा निभाते गए रिश्ते मजबूत होते गए।
मुस्कुराते मुस्कुराते कब मुस्कुराने की वजह बन गए
कुछ रिश्ते ऐसे मिले जो बेवजह हो कर भी सबा ( सुबह की हवा) बन गए।

सर्दियों की धूप और गर्मियों की प्यास जैसा है इन रिश्तों का एहसास
कुछ ना होकर भी है बहुत खास
सुना है नाम के रिश्तों की उम्र कम होती है।
इसी लिए कभी नहीं होने दूंगी इन्हे किसी नाम का मोहताज।

Thursday, 19 September 2019

आजादी

आज  फिर कलम उठाने का मन हो रहा है
खुद को ही आइना दिखाने का मन हो रहा है
सुना है कलम में बड़े बड़े बदलाव की ज्वाला होती है
आज उसी कलम को आजमाने का मन हो रहा है।

कानून जो कभी सबका हुआ करता था आज बस गरीबों का बन के रह गया ।
आजादी की आग में झुलस के रह गया।
कहने को उन्नीवीं शताब्दी में  ही हम आजाद हो गए थे लेकिन वाह रे इंसान तूने तो आजादी  का ऐसा  जश्न मनाया, होली ,लोहारी, ईद को जुदा कर दिखाया।
गांधी ने देश को आजाद कराया तो नेहरु और जिन्ना ने बटवाया।

एक हसने की चाह ने हमें कितना रुलाया है।
मंजिल तक पहुंचने  से पहले ही रास्तों को बटवाया।
कभी धर्म तो कभी कर्म का भेद
कभी लिंग तो कभी मर्म का भेद
बस भेद ही तो सबको नजर आया
लेकिन रक्त का रंग लाल के सिवा दूजा ना पाया।

कुछ यूं हुई उन्नीवीं सदी पुरानी , और आई  सदी इक्कीसवीं  सुहानी
विकास की आंधी कहे या बदलाव की आग
चमक उठा हर तरफ technology  का मेहताब
टेलीफोन टेलीविजन हुए पुराने आए मोबाइल इंटरनेट के जमाने।
उधर गलियों में  टेलीफोन लाइन के तार कट रहे थे इधर सब अपनों  में फोन बंट रहे थे।
अब बन्द हो चुकी थी एक ही टेलीफोन से पूरे मोहल्ले की बात होना
सब शुरू कर चुके थे खुद में खोना।

कुछ दशक भर चलता रहा यह सिलसिला
फिर आया स्मार्ट फोन जो मंदिर के प्रसाद की तरह सबको ही मिला।
अब हालात ये है साहब इंसान फोन को नहीं फोन इंसान को चलाने लगा
आजादी के बाद क्या खोया क्या पाया याद आने लगा।

Monday, 16 September 2019

अनजान किताब

इक  रोज़ मिली वो अनजान सी किताब जो खुल कर भी ना खुली थी।
हिसाब था उसमे सब की अच्छाई और बुराइयों का लेकिन पढ़ कर भी ना पढ़ी थी ।
जब खुलने लगी तो लगा सिर्फ कुछ राज है।
जब पढ़ा तो लगा एक एहसास है।
और जब महसूस किया तो समझा एक अलग सा जज्बात है।
हर इक पन्ने पर लिखा था कुछ ऐसा कहने लायक  कुछ नहीं फिर भी बहुत कुछ समझ लिया हो जैसा ।
आसान इतनी थी कि मानो सब कुछ पता हो , समझना और  समझाना किसी ओर ही भाषा में हुआ हो।
ये factul किताबों के बीच मिली एक  actual किताब है।
अपनेपन और reality का अलग ही अंदाज है।
समझ नहीं आता पढ़ने के शौक ने इस किताब को समझाया या इस किताब ने पढ़ने के शौक को जगाया।
बस अब मुस्कुराहट के  highlighter से हर पन्ने की उस लाइन को  highlight करना है जो
पढ़ते हुए  चेहरे पर सलवट लाए।
काश इस अनजान सी किताब का हर पन्ना यु ही खुलता जाए।☺️☺️

Friday, 13 September 2019

लेकिन...….

लो आज आ ही गया वो दिन जब लंबी छुट्टियों से वापस लौट रही हूं आप सब के बिन।
जी तो चाहता है पूरा घर समेट लू
अपने इस छोटे से बैग में और आप सब को कहीं छुपा लु अपने जीन्स की जेब में।
लेकिन......
कभी पापा का लाड तो कभी मम्मा की लताड़
कभी छोटी के साथ tiktok पर प्यार तो कभी दोस्तो के साथ शरारत बेशुमार।
याद आयेंगे ये सब दिन में ना जाने कितनी बार।
लेकिन........
दिन भर बिना नहाए घूमना देर तक सोना
बिना बात के चिल्लाना और जरा सी लगने पर जोर जोर से रोना।
ये सब अब नहीं किया जाएगा बर्दाश्त क्योंकि वहां ओढ़ना होगा समझदारी का झूठा लिबास।
लेकिन........
वैसे बहोत स्ट्रॉन्ग हो गई हूं अब तो रोना भी छोर दिया है
शायद इसी लिए लिखना शुरू किया है।
इस " लेकिन "को समझना  आसान नहीं है   बस इतना समझ लो  मजबूरी और जिम्मेदारी नहीं कुछ अपनों के सपने है।
अक्सर जब दिल भर आता है तो आंसू शब्द बन के कागज पे उतर आते है।
समझना और समझना तो बस बहाने है अपने तो एक मुस्कान देख के ही समझ जाते है।
जानती हूं आप लोग भी बस दिन और रात खुद को समझा रहे है कि इसको बस मुस्कुराते हुए भेझना है लेकिन टैंशन ना लो में भी आप का ही अंश लाा हूं इतनी आसानी से रोने वाली नहीं ।