आज कल कुछ यूं चल रहा है जिंदगी का दौर
सुबह कहीं ,दिन कहीं और शामे कहीं ओर
कुछ पराए हो कर भी अपनों से बढ़ के हो गए
और कुछ अपने परायो की भीड़ में खो गए
लेना और देना तो क्या ही था साहब
मीठे बोल किसका क्या ले गए।
इज्जत के बदले इज्जत प्यार के बदले प्यार इसी नई सोच ने रिश्तों की पुरानी इमारतों को भी ढाया है।
गर्मियों में ननिहाल जाने की बाते हुए पुरानी अब तो समर वेकेशन में hill station ghumne ka jamana आया है।
कुछ हालात का शिकार हुए तो कुछ गलतफहमी की आंधी में उड़ गए ।
रिश्ते जो कभी कई थे अपने अपने रास्तों पर मुड गए। इसे नए फ़ैशन का दौर समझे या रिश्तों की टूटती हुई डोर।
अपने सब मतलबी हवा में बह गए और रिश्तों के बस कुछ नाम रह गए।
कोई पीठ पीछे प्यार से आपका नाम ले
यही है ज़िन्दगी भर की कमाई बाकी चीज़े तो मैं पहचान ही ना पाई।
जिन्होंने मुझे समझा उनके लिए अनमोल हो गई जो ना समझ पाए उनके लिए फ़िज़ूल कहलाई
बस यूंही मिले कुछ अनजान चेहरे ऐसे भी
जो है ज़रा खास कुछ ना होकर भी।
इन बेमतलब के रिश्तों में कुछ खास नहीं था
ना उम्मीद ना एहसास बस मुस्कुराहट का एक वादा था
वादा निभाते गए रिश्ते मजबूत होते गए।
मुस्कुराते मुस्कुराते कब मुस्कुराने की वजह बन गए
कुछ रिश्ते ऐसे मिले जो बेवजह हो कर भी सबा ( सुबह की हवा) बन गए।
सर्दियों की धूप और गर्मियों की प्यास जैसा है इन रिश्तों का एहसास
कुछ ना होकर भी है बहुत खास
सुना है नाम के रिश्तों की उम्र कम होती है।
इसी लिए कभी नहीं होने दूंगी इन्हे किसी नाम का मोहताज।
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