आज फिर कलम उठाने का मन हो रहा है
खुद को ही आइना दिखाने का मन हो रहा है
सुना है कलम में बड़े बड़े बदलाव की ज्वाला होती है
आज उसी कलम को आजमाने का मन हो रहा है।
कानून जो कभी सबका हुआ करता था आज बस गरीबों का बन के रह गया ।
आजादी की आग में झुलस के रह गया।
कहने को उन्नीवीं शताब्दी में ही हम आजाद हो गए थे लेकिन वाह रे इंसान तूने तो आजादी का ऐसा जश्न मनाया, होली ,लोहारी, ईद को जुदा कर दिखाया।
गांधी ने देश को आजाद कराया तो नेहरु और जिन्ना ने बटवाया।
एक हसने की चाह ने हमें कितना रुलाया है।
मंजिल तक पहुंचने से पहले ही रास्तों को बटवाया।
कभी धर्म तो कभी कर्म का भेद
कभी लिंग तो कभी मर्म का भेद
बस भेद ही तो सबको नजर आया
लेकिन रक्त का रंग लाल के सिवा दूजा ना पाया।
कुछ यूं हुई उन्नीवीं सदी पुरानी , और आई सदी इक्कीसवीं सुहानी
विकास की आंधी कहे या बदलाव की आग
चमक उठा हर तरफ technology का मेहताब
टेलीफोन टेलीविजन हुए पुराने आए मोबाइल इंटरनेट के जमाने।
उधर गलियों में टेलीफोन लाइन के तार कट रहे थे इधर सब अपनों में फोन बंट रहे थे।
अब बन्द हो चुकी थी एक ही टेलीफोन से पूरे मोहल्ले की बात होना
सब शुरू कर चुके थे खुद में खोना।
कुछ दशक भर चलता रहा यह सिलसिला
फिर आया स्मार्ट फोन जो मंदिर के प्रसाद की तरह सबको ही मिला।
अब हालात ये है साहब इंसान फोन को नहीं फोन इंसान को चलाने लगा
आजादी के बाद क्या खोया क्या पाया याद आने लगा।
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