Friday, 13 September 2019

लेकिन...….

लो आज आ ही गया वो दिन जब लंबी छुट्टियों से वापस लौट रही हूं आप सब के बिन।
जी तो चाहता है पूरा घर समेट लू
अपने इस छोटे से बैग में और आप सब को कहीं छुपा लु अपने जीन्स की जेब में।
लेकिन......
कभी पापा का लाड तो कभी मम्मा की लताड़
कभी छोटी के साथ tiktok पर प्यार तो कभी दोस्तो के साथ शरारत बेशुमार।
याद आयेंगे ये सब दिन में ना जाने कितनी बार।
लेकिन........
दिन भर बिना नहाए घूमना देर तक सोना
बिना बात के चिल्लाना और जरा सी लगने पर जोर जोर से रोना।
ये सब अब नहीं किया जाएगा बर्दाश्त क्योंकि वहां ओढ़ना होगा समझदारी का झूठा लिबास।
लेकिन........
वैसे बहोत स्ट्रॉन्ग हो गई हूं अब तो रोना भी छोर दिया है
शायद इसी लिए लिखना शुरू किया है।
इस " लेकिन "को समझना  आसान नहीं है   बस इतना समझ लो  मजबूरी और जिम्मेदारी नहीं कुछ अपनों के सपने है।
अक्सर जब दिल भर आता है तो आंसू शब्द बन के कागज पे उतर आते है।
समझना और समझना तो बस बहाने है अपने तो एक मुस्कान देख के ही समझ जाते है।
जानती हूं आप लोग भी बस दिन और रात खुद को समझा रहे है कि इसको बस मुस्कुराते हुए भेझना है लेकिन टैंशन ना लो में भी आप का ही अंश लाा हूं इतनी आसानी से रोने वाली नहीं ।

No comments:

Post a Comment