Monday, 2 December 2019

खामोशी की आवाज

 

मै तो नारी थी पर अब खिलौने वाली गुड़िया कहलाऊं।
बयां कर सकूं अपना दर्द ऐसी जुबान कहां से लाऊं।
हर महीने बहा कर रक्त अपना तुझे बाप बनाऊ।
फिर तेरे ही अंश से ना जाने कितनी लाज निर्लज्ज करवाऊं।

दामन पर मेरे कीचड़ उछालने वाले तू भी वही से आया है जहां से मै आई।
फिर तेरा हर गुनाह बहादुरी और मेरी तो आवाज पर भी  सबने उंगली उठाई।
लिख सकूं इस दोगले समाज की असलियत वो शब्द कहा से लाऊं।
मै तो नारी थी पर अब खिलोने वाली गुड़िया कहलाऊं।

बस मा बापू के कुछ सपने ही तो पूरे करना चाहती थी।
इसमें मेरी क्या गलती है अगर तेरी आंखो को मै भाती थी।
जानवरों की डॉक्टर होकर भी तेरे अंदर के जानवर को नहीं पहचान पाई।
उड़ान भरने से पहले ही मेरे पंखों में तूने आग लगाई।

मेरी छोटी स्कर्ट और टाइट जींस पर तो सबको बड़ी शर्म आती थी।
देर रात बाहर जाने से रोकना और भी ना जाने कितनी पाबन्दियां मुझ पे लगाई जाती थी।
जरा सी पाबंदी अपने लडलो पर लगाई होती,
ना जाने कितनी मासूम अपनी मा की गोद में ना रोती।

मेरे दर्द को समझ पाना तेरे बस में नहीं तू बस उस दिन का इंतजार कर जब कोई खेले तेरे जिस्म से किसी रास्ते पर और फेक दे तुझे कचरे में कहीं।
यकीनन तेरी मा का आंचल भी शर्मिंदा हुआ होगा
मन  में बसे लाडले के  चित्र  में उसे आज हवस का दरिंदा नजर आया होगा।
पर मेरा बेटा बेकसूर है उस मा ने सबको यही समझाया होगा।

अब अपने आंसू छुपा सकू वो नयन कहा से लाऊं । मै तो मन ही मन अपने ही अस्तित्व से जी चुराऊं।
पापा की परी के पंखों को जलाया है, मेरे पापा को तूने आज बहुत रुलाया है।
चली गई हूं ये सोच के तूने तो मुझे मार दिया लेकिन वापस आऊगी तुझे रुलाने ये मैने प्रण लिया।

Thursday, 31 October 2019

संयम : एक युद्ध अपने ही विरुद्ध

युद्ध मन का मस्तिष्क से हो या तन का तनिष्क (गहनों) से,
संयम रखने की सलाह हमेशा  दी जाती है।
पर जब खुद को संयम रखना पड़े  तो बात भारी हो जाती है।
तो क्यों ना आज  इस संयम पर ही कुछ लिखा जाए, और धीर  संयम धरने की बातों पर  गोर किया जाए ।

मनुष्य इच्छाओं का एक पुंज(गुच्छा) है,    
और इस पुंज का ही ये संसार निकुंज (जंगल) है।
निकुंज में प्रवाहित हो  रही धारा की पतवार  संयम,
आत्मा का सहज स्वभाव संयम,
भोग और योग के मध्य संयम,
आत्मा का परमात्मा से  सानिध्य संयम,

संयम की ही  दीवार  रही दैत्यों और देवो के बीच,
संयम ही वो हल है जिस से चरित्र की भूमि को सींच
दमित और अदमित इच्छाओं का अंतिम द्वार है संयम,
भक्ति और मुक्ति का पहला पठार है संयम।

संयमी नयन कभी झुके नहीं संयमी कदम कभी रुके नहीं,
अंततः तुझे यू ही बह ते जाना है संयम का धर्म अपनाना है।
संयमी अश्व पर बैठ और कर इस निकुंज की सैर कभी
यहां कुछ तेरा नहीं कुछ मेरा नहीं सब बेगाना है। 

आग में पानी सा है संयम ,कलह में बोली गई मीठी वाणी है संयम।
त्यागने योग्य इस  संसार में धार्य (धारण करने योग्य)भाव है संयम।
आधुनिक युग में जिसका अभाव है वही है संयम।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बौद्ध सब धर्म की बात भी  संयम ।
गीता बाइबल कुरान का सार ही संयम।

Tuesday, 22 October 2019

किन्नर की व्यथा

बनाने वाले ने मुझे भी क्या बनाया इतना रूप दिया
पर कुछ स्पष्ट नहीं समझाया।
मन दे कर नारी का नर सा शरीर बनाया ।
कैसी विचित्र रचना है ऊपरवाले ये  तेरी
इंसान का जन्म देकर  इंसान ही नहीं बनाया।

जब गलती तूने की है तो मै क्यों पछताऊं, कुछ तो सोचा ही होगा तूने तो  मै क्यों तेरी रचना पे सवाल उठाउ ।
इस  दोगले जीवन से कुछ ना मिला शिकायत कर।
मै खुश हूं लोगो की खुशियों में ताली बजा  कर।

कोई मुझे देख हंसता है तो कोई मेरे आशीर्वाद के लिए मरता है।
कभी देश में मेरे लिए बराबरी का दर्जा मांगा जाता है।
तो कभी मझे सड़कों पे सारे आम नोचा जाता है।
लेकिन तेरी इस दुनिया में मै गुमनाम होकर खुश हूं।
क्योंकि विश्वास लायक अब  ना तो नर बचे है ना नारी
बस बची है तो ये विचित्र सी जाति हमारी।

श्रृंगार नारी का कर नर जैसी आवाज बड़ी लुभाती है मुझे
तेरी इस करीगरी पर बहुत हंसी आती है मुझे
खैर इस मतलबी दुनिया में कोई तो दुआ देने वाला चाहिए।
जरूर ये ही ख्याल तेरे दिमाग में आया होगा,
और इसी लिए तूने नर -नारी के इस मिश्रित रूप को बनाया होगा।

खुद बे ओलाद है लेकिन कभी किसी की ओलाद को   बददुआ नहीं दी
तेरी  उत्कृष्ट कृति नर- नारी  जैसे नहीं जो बिना मतलब किसी से यारी नहीं कि।
अरे माना कोई परिवार नहीं है इस जीवन में हमारा
और ना ही हमें समाज ने अपनाया।
पर जरा कभी कह के तो दिखा किसका दिल दुखाया ।

ऐसी दाग भरी जिंदगी जीने से अच्छा में गुमनाम ही ठीक हूं।
अपने तन और मन के इस बेमेल योग से अनजान ही ठीक हूं।
कम से कम अकेली लड़की को हिम्मत तो दे सकता हूं।
किसी परेशान मां कि उलझन तो दूर कर सकता हूं।
अकेली  बहन को रात में उसके घर तो पहुंचा सकता हूं।

Sunday, 22 September 2019

रिश्ते

आज कल कुछ यूं चल रहा है जिंदगी का दौर
सुबह कहीं ,दिन कहीं और शामे कहीं ओर
कुछ पराए हो कर भी अपनों से बढ़ के हो गए
और कुछ अपने  परायो की भीड़ में खो गए
लेना और देना तो क्या ही था साहब
मीठे बोल किसका क्या ले गए।

इज्जत के बदले इज्जत प्यार के बदले प्यार इसी नई सोच ने रिश्तों की पुरानी इमारतों को भी ढाया है।
गर्मियों में ननिहाल जाने की बाते हुए पुरानी अब तो समर वेकेशन में  hill station ghumne ka jamana आया है।

कुछ हालात का शिकार हुए तो कुछ गलतफहमी की आंधी में उड़ गए ।
रिश्ते जो कभी कई थे अपने अपने रास्तों पर मुड गए। इसे नए फ़ैशन का दौर समझे या रिश्तों की टूटती हुई डोर।
अपने सब मतलबी हवा में बह गए और रिश्तों  के  बस कुछ नाम रह गए।

कोई पीठ पीछे प्यार से आपका नाम ले
यही है ज़िन्दगी भर की कमाई बाकी चीज़े तो मैं पहचान ही ना पाई।
जिन्होंने मुझे समझा उनके लिए अनमोल हो गई जो ना समझ पाए उनके लिए फ़िज़ूल कहलाई
बस यूंही मिले  कुछ अनजान चेहरे ऐसे भी
जो है ज़रा खास कुछ ना होकर भी।

इन बेमतलब के रिश्तों में कुछ खास नहीं था
ना उम्मीद ना एहसास बस मुस्कुराहट का एक वादा था
वादा निभाते गए रिश्ते मजबूत होते गए।
मुस्कुराते मुस्कुराते कब मुस्कुराने की वजह बन गए
कुछ रिश्ते ऐसे मिले जो बेवजह हो कर भी सबा ( सुबह की हवा) बन गए।

सर्दियों की धूप और गर्मियों की प्यास जैसा है इन रिश्तों का एहसास
कुछ ना होकर भी है बहुत खास
सुना है नाम के रिश्तों की उम्र कम होती है।
इसी लिए कभी नहीं होने दूंगी इन्हे किसी नाम का मोहताज।

Thursday, 19 September 2019

आजादी

आज  फिर कलम उठाने का मन हो रहा है
खुद को ही आइना दिखाने का मन हो रहा है
सुना है कलम में बड़े बड़े बदलाव की ज्वाला होती है
आज उसी कलम को आजमाने का मन हो रहा है।

कानून जो कभी सबका हुआ करता था आज बस गरीबों का बन के रह गया ।
आजादी की आग में झुलस के रह गया।
कहने को उन्नीवीं शताब्दी में  ही हम आजाद हो गए थे लेकिन वाह रे इंसान तूने तो आजादी  का ऐसा  जश्न मनाया, होली ,लोहारी, ईद को जुदा कर दिखाया।
गांधी ने देश को आजाद कराया तो नेहरु और जिन्ना ने बटवाया।

एक हसने की चाह ने हमें कितना रुलाया है।
मंजिल तक पहुंचने  से पहले ही रास्तों को बटवाया।
कभी धर्म तो कभी कर्म का भेद
कभी लिंग तो कभी मर्म का भेद
बस भेद ही तो सबको नजर आया
लेकिन रक्त का रंग लाल के सिवा दूजा ना पाया।

कुछ यूं हुई उन्नीवीं सदी पुरानी , और आई  सदी इक्कीसवीं  सुहानी
विकास की आंधी कहे या बदलाव की आग
चमक उठा हर तरफ technology  का मेहताब
टेलीफोन टेलीविजन हुए पुराने आए मोबाइल इंटरनेट के जमाने।
उधर गलियों में  टेलीफोन लाइन के तार कट रहे थे इधर सब अपनों  में फोन बंट रहे थे।
अब बन्द हो चुकी थी एक ही टेलीफोन से पूरे मोहल्ले की बात होना
सब शुरू कर चुके थे खुद में खोना।

कुछ दशक भर चलता रहा यह सिलसिला
फिर आया स्मार्ट फोन जो मंदिर के प्रसाद की तरह सबको ही मिला।
अब हालात ये है साहब इंसान फोन को नहीं फोन इंसान को चलाने लगा
आजादी के बाद क्या खोया क्या पाया याद आने लगा।

Monday, 16 September 2019

अनजान किताब

इक  रोज़ मिली वो अनजान सी किताब जो खुल कर भी ना खुली थी।
हिसाब था उसमे सब की अच्छाई और बुराइयों का लेकिन पढ़ कर भी ना पढ़ी थी ।
जब खुलने लगी तो लगा सिर्फ कुछ राज है।
जब पढ़ा तो लगा एक एहसास है।
और जब महसूस किया तो समझा एक अलग सा जज्बात है।
हर इक पन्ने पर लिखा था कुछ ऐसा कहने लायक  कुछ नहीं फिर भी बहुत कुछ समझ लिया हो जैसा ।
आसान इतनी थी कि मानो सब कुछ पता हो , समझना और  समझाना किसी ओर ही भाषा में हुआ हो।
ये factul किताबों के बीच मिली एक  actual किताब है।
अपनेपन और reality का अलग ही अंदाज है।
समझ नहीं आता पढ़ने के शौक ने इस किताब को समझाया या इस किताब ने पढ़ने के शौक को जगाया।
बस अब मुस्कुराहट के  highlighter से हर पन्ने की उस लाइन को  highlight करना है जो
पढ़ते हुए  चेहरे पर सलवट लाए।
काश इस अनजान सी किताब का हर पन्ना यु ही खुलता जाए।☺️☺️

Friday, 13 September 2019

लेकिन...….

लो आज आ ही गया वो दिन जब लंबी छुट्टियों से वापस लौट रही हूं आप सब के बिन।
जी तो चाहता है पूरा घर समेट लू
अपने इस छोटे से बैग में और आप सब को कहीं छुपा लु अपने जीन्स की जेब में।
लेकिन......
कभी पापा का लाड तो कभी मम्मा की लताड़
कभी छोटी के साथ tiktok पर प्यार तो कभी दोस्तो के साथ शरारत बेशुमार।
याद आयेंगे ये सब दिन में ना जाने कितनी बार।
लेकिन........
दिन भर बिना नहाए घूमना देर तक सोना
बिना बात के चिल्लाना और जरा सी लगने पर जोर जोर से रोना।
ये सब अब नहीं किया जाएगा बर्दाश्त क्योंकि वहां ओढ़ना होगा समझदारी का झूठा लिबास।
लेकिन........
वैसे बहोत स्ट्रॉन्ग हो गई हूं अब तो रोना भी छोर दिया है
शायद इसी लिए लिखना शुरू किया है।
इस " लेकिन "को समझना  आसान नहीं है   बस इतना समझ लो  मजबूरी और जिम्मेदारी नहीं कुछ अपनों के सपने है।
अक्सर जब दिल भर आता है तो आंसू शब्द बन के कागज पे उतर आते है।
समझना और समझना तो बस बहाने है अपने तो एक मुस्कान देख के ही समझ जाते है।
जानती हूं आप लोग भी बस दिन और रात खुद को समझा रहे है कि इसको बस मुस्कुराते हुए भेझना है लेकिन टैंशन ना लो में भी आप का ही अंश लाा हूं इतनी आसानी से रोने वाली नहीं ।

Sunday, 21 April 2019

A Vote For Selfie

Chalo kuch baat GENDER EQUALITY ki kr lete hai.
Tik-Tok se zara dhyan hata kr SAMAJ me dekh lete hai.
Women rights ki baate kr kr k women ko hi kamzor bnate hai.
Fir empowerment k naam pr leaders vote kamate hai.
Lakin hume kya karna hai bs selfie k liye vote dena hai.

Kya hi fark padta hai Govt. Kiski hai.
Jhuthe waado ki baarish paaki hai.
Baarish me kisan ki fasal beh gai,
Bs leaders ki Hindu-Muslim wali neeti reh gai.
Lakin hume  kya karna hai  bs selfie k liye vote dena hai.

Reservation ho ya Globalization,
Ya increase ho rhi population,
Capital bane jaye rape country,
Ya fir iss pe bane koi documentry.
Zyada se zyada hum kr lege candle march.
Iss se zyada to hume kya karna hai bs selfie ke liye vote dena hai.

Army loss hone pr black Status laga lege.
Jawana Sahid hone pr black ribbon dp kr lege.
Bs ek virtual patriotism dikhana hai,
Qki show off ka jamana hai.
Or Hume kya karna hai bs selfie k liye vote dena hai.                                   TRIPTI CHAUHAN

Saturday, 20 April 2019

English Medium Factories

FOREIGNERS are sending their children to GURUKULS,
For a better life  and for  SANSKARS,
We the INDIAN putting our children into
ENGLISH MEDIUM FECTORIES,
For a bright future and luxury cars.

Development is not bad but
You can't destroy the image of your dad.
Indian culture and society has been representing as The MOTHER itself.
We the INDIAN are fitting into the western shelf.

Language is Respectable but to insult a particular Language is not Applicable.
English has become another stream of science in INDIAN SCHOOL.
That is assuming NATIONAL LANGUAGE is fool.

We the INDIAN are getting modern and
Feeding our brain with more and more fects.
They THE FOREIGNERS chanting GEETA, RAMAYAN and VEDAS.

Just think where are we going,
Developing or destroying...??

BY - TRIPTI CHAUHAN

Thursday, 18 April 2019

#COMPETITIVE EXAMS

Hum kaise ja rahe hai shayad nai pta,
Lakin ha ye pta h ki jaana kaha h.
Raste alag h to kya manzil ek hi h,
To q na manjil tk saath hi chale.

Destination pe pahuchna hi success hai
Ye sahi hai,pr ye bhi  to sahi nahi ki akele hi successful bane.
To q na manjil tk saath hi chale.

Koi UPSC to koi SSC,
koi RPSC to koi Railway ,
Hum Sab lage hue hai poore joro se qki sbhi chahte hai  ki successful bane.
To q na manzil tk saath hi chale.

Wo purani dosti zara fir se yaad kr le,
TOM &JERRY fir se TV pr on kr le,
Maana Zaruri h PADHAI karna UPSE ,RPSE SSC k liye.
Lakin Dil ka khush rehna jaruri h PADHAI k liye.
To q na manzil tk saath hi chale.

Competition ko bs  exams tak hi rehne de,
Khud ko shaam ki chaaye dosto k saath peene de.
Aao DOSTI K PLANT ki fir se gardening kre.

To kyo na manjil tk sb saath hi chale......

Composed by
TRIPTI CHAUHAN