Tripti Chauhan
Tuesday, 15 June 2021
शहर
Thursday, 18 March 2021
DEAR LIZARD !
Monday, 13 January 2020
डरते है अपने ही घर के जयचंदो से
मोहतरमा ने क्या खूब फरमाया, रहे उसी मुल्क मे जो अपने मुल्क के न हुए वो पाकिस्तान के क्या होगे,
देश के गद्दारों अब कहा बसोगे, खुद को धोभी का कुत्ता ही कहोगे।
अखंड एकता के नारे लगाते लगाते अब जातिवाद से सत्ता को सजाने लगे है।
आरक्षण के नाम पर देश के जिम्मेदार बस अपनी सरकार का अस्तित्व बचाने लगे है।
कभी हारे नहीं हम युद्धों में डरते है छल छंदों से ,
हर बार पराजय पाई है अपने ही घर के जयचंदो से।
सर्जिकल के सबूत मांगे तो कभी एयर स्ट्राइक के निशान,
जागरूकता के अधिकारों की थी इन्हे बखूबी पहचान।
तो फिर क्यों खुद को तुमने बेचारा बताया जब सरकार ने देश में रहने का एक पत्र मंगवाया।
कहीं चोर की दाढ़ी में तिनका तो नहीं, गद्दारी का राज खुलने की चिंता तो नहीं।
पत्र की वैधता - अवैधता सरकार का फैसला है लेकिन तुमको तो प्रूव करने में ही मसला है।
बेटियां तुमसे सुरक्षित हो नहीं रही वजूद पर शक होना लाज़मी है।
अगर सच्चे देशवासी हो तो #NRC समर्थन में क्यों कमी है।
संसद में बैठी दीदी दलित आरक्षण का नारा लगती है,तो
कुछ जय परशुराम कहकर ब्राह्मणों के हृदय में बैठ जाते है।
संविधान में लिखे "समानता के अधिकार"की धारा को कैसे ये जिम्मेदार राजनेता भूल जाते है।
खुद को भारतीय कहकर चोरी से पड़ोसी मुल्क का समर्थन करते है।
मेरे देश में कुछ ऐसे महान राजनीतिज्ञ सत्ताप्रेमी भी बसते है।
भगत सिंह होते तो बड़ा पछतावा करते बेकार ही गई उनकी जवानी और फांसी के वो तख्ते।
राजनेता अपने घर भरने लगे है और युवा की तो बस ये कहानी है राज सिमरन का और सिमरन राज की दीवानी है।
ज़्यादा कुछ कहे तो कम नहीं होगा युवा पीढ़ी की अंधता देखते हुए लगता है देश की बरबादी का इनको कोई ग़म नहीं होगा।
कभी देशभक्ति तो कभी अंधी जागरूकता के नाम पर प्रोटेस्ट करते है सोशल मीडिया के लिए।
बाकी सब जाए भाड़ में इन्होंने तो वह भी सुट्टे ही पिए।
कलम के क्षत्रिय भी आजकल हास्य रस उत्पन्न कर जीविका चला रहे है।
कौन फसे इस गंदी राजनीति में सब अपना आंचल छुपा रहे है।
जरा इतिहास उठा के देखिए कलम के हुनारबाजो ने क्या तहलका मचाया है।
कुंठित युवा पीढ़ी से तो हास्य रास को ही तवज्जों मिलते पाया है।
भगवा और हरे रंग का भेद खत्म हो जाए काश कोई कलम कागज को कुछ इस तरह भी रौंद पाए।
शांति का वो सफेद रंग सिर्फ तिरंगे में ही नहीं मेरे देश में भी देखा जाए।
कभी हारे नहीं हम युद्धों से डरते है छल छंदों से,
हर बार पराजय पाई है हमने अपने ही घर के जयचंदो से।
Monday, 2 December 2019
खामोशी की आवाज
मै तो नारी थी पर अब खिलौने वाली गुड़िया कहलाऊं।
बयां कर सकूं अपना दर्द ऐसी जुबान कहां से लाऊं।
हर महीने बहा कर रक्त अपना तुझे बाप बनाऊ।
फिर तेरे ही अंश से ना जाने कितनी लाज निर्लज्ज करवाऊं।
दामन पर मेरे कीचड़ उछालने वाले तू भी वही से आया है जहां से मै आई।
फिर तेरा हर गुनाह बहादुरी और मेरी तो आवाज पर भी सबने उंगली उठाई।
लिख सकूं इस दोगले समाज की असलियत वो शब्द कहा से लाऊं।
मै तो नारी थी पर अब खिलोने वाली गुड़िया कहलाऊं।
बस मा बापू के कुछ सपने ही तो पूरे करना चाहती थी।
इसमें मेरी क्या गलती है अगर तेरी आंखो को मै भाती थी।
जानवरों की डॉक्टर होकर भी तेरे अंदर के जानवर को नहीं पहचान पाई।
उड़ान भरने से पहले ही मेरे पंखों में तूने आग लगाई।
मेरी छोटी स्कर्ट और टाइट जींस पर तो सबको बड़ी शर्म आती थी।
देर रात बाहर जाने से रोकना और भी ना जाने कितनी पाबन्दियां मुझ पे लगाई जाती थी।
जरा सी पाबंदी अपने लडलो पर लगाई होती,
ना जाने कितनी मासूम अपनी मा की गोद में ना रोती।
मेरे दर्द को समझ पाना तेरे बस में नहीं तू बस उस दिन का इंतजार कर जब कोई खेले तेरे जिस्म से किसी रास्ते पर और फेक दे तुझे कचरे में कहीं।
यकीनन तेरी मा का आंचल भी शर्मिंदा हुआ होगा
मन में बसे लाडले के चित्र में उसे आज हवस का दरिंदा नजर आया होगा।
पर मेरा बेटा बेकसूर है उस मा ने सबको यही समझाया होगा।
अब अपने आंसू छुपा सकू वो नयन कहा से लाऊं । मै तो मन ही मन अपने ही अस्तित्व से जी चुराऊं।
पापा की परी के पंखों को जलाया है, मेरे पापा को तूने आज बहुत रुलाया है।
चली गई हूं ये सोच के तूने तो मुझे मार दिया लेकिन वापस आऊगी तुझे रुलाने ये मैने प्रण लिया।
Thursday, 31 October 2019
संयम : एक युद्ध अपने ही विरुद्ध
युद्ध मन का मस्तिष्क से हो या तन का तनिष्क (गहनों) से,
संयम रखने की सलाह हमेशा दी जाती है।
पर जब खुद को संयम रखना पड़े तो बात भारी हो जाती है।
तो क्यों ना आज इस संयम पर ही कुछ लिखा जाए, और धीर संयम धरने की बातों पर गोर किया जाए ।
मनुष्य इच्छाओं का एक पुंज(गुच्छा) है,
और इस पुंज का ही ये संसार निकुंज (जंगल) है।
निकुंज में प्रवाहित हो रही धारा की पतवार संयम,
आत्मा का सहज स्वभाव संयम,
भोग और योग के मध्य संयम,
आत्मा का परमात्मा से सानिध्य संयम,
संयम की ही दीवार रही दैत्यों और देवो के बीच,
संयम ही वो हल है जिस से चरित्र की भूमि को सींच
दमित और अदमित इच्छाओं का अंतिम द्वार है संयम,
भक्ति और मुक्ति का पहला पठार है संयम।
संयमी नयन कभी झुके नहीं संयमी कदम कभी रुके नहीं,
अंततः तुझे यू ही बह ते जाना है संयम का धर्म अपनाना है।
संयमी अश्व पर बैठ और कर इस निकुंज की सैर कभी
यहां कुछ तेरा नहीं कुछ मेरा नहीं सब बेगाना है।
आग में पानी सा है संयम ,कलह में बोली गई मीठी वाणी है संयम।
त्यागने योग्य इस संसार में धार्य (धारण करने योग्य)भाव है संयम।
आधुनिक युग में जिसका अभाव है वही है संयम।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बौद्ध सब धर्म की बात भी संयम ।
गीता बाइबल कुरान का सार ही संयम।
Tuesday, 22 October 2019
किन्नर की व्यथा
बनाने वाले ने मुझे भी क्या बनाया इतना रूप दिया
पर कुछ स्पष्ट नहीं समझाया।
मन दे कर नारी का नर सा शरीर बनाया ।
कैसी विचित्र रचना है ऊपरवाले ये तेरी
इंसान का जन्म देकर इंसान ही नहीं बनाया।
जब गलती तूने की है तो मै क्यों पछताऊं, कुछ तो सोचा ही होगा तूने तो मै क्यों तेरी रचना पे सवाल उठाउ ।
इस दोगले जीवन से कुछ ना मिला शिकायत कर।
मै खुश हूं लोगो की खुशियों में ताली बजा कर।
कोई मुझे देख हंसता है तो कोई मेरे आशीर्वाद के लिए मरता है।
कभी देश में मेरे लिए बराबरी का दर्जा मांगा जाता है।
तो कभी मझे सड़कों पे सारे आम नोचा जाता है।
लेकिन तेरी इस दुनिया में मै गुमनाम होकर खुश हूं।
क्योंकि विश्वास लायक अब ना तो नर बचे है ना नारी
बस बची है तो ये विचित्र सी जाति हमारी।
श्रृंगार नारी का कर नर जैसी आवाज बड़ी लुभाती है मुझे
तेरी इस करीगरी पर बहुत हंसी आती है मुझे
खैर इस मतलबी दुनिया में कोई तो दुआ देने वाला चाहिए।
जरूर ये ही ख्याल तेरे दिमाग में आया होगा,
और इसी लिए तूने नर -नारी के इस मिश्रित रूप को बनाया होगा।
खुद बे ओलाद है लेकिन कभी किसी की ओलाद को बददुआ नहीं दी
तेरी उत्कृष्ट कृति नर- नारी जैसे नहीं जो बिना मतलब किसी से यारी नहीं कि।
अरे माना कोई परिवार नहीं है इस जीवन में हमारा
और ना ही हमें समाज ने अपनाया।
पर जरा कभी कह के तो दिखा किसका दिल दुखाया ।
ऐसी दाग भरी जिंदगी जीने से अच्छा में गुमनाम ही ठीक हूं।
अपने तन और मन के इस बेमेल योग से अनजान ही ठीक हूं।
कम से कम अकेली लड़की को हिम्मत तो दे सकता हूं।
किसी परेशान मां कि उलझन तो दूर कर सकता हूं।
अकेली बहन को रात में उसके घर तो पहुंचा सकता हूं।
Sunday, 22 September 2019
रिश्ते
आज कल कुछ यूं चल रहा है जिंदगी का दौर
सुबह कहीं ,दिन कहीं और शामे कहीं ओर
कुछ पराए हो कर भी अपनों से बढ़ के हो गए
और कुछ अपने परायो की भीड़ में खो गए
लेना और देना तो क्या ही था साहब
मीठे बोल किसका क्या ले गए।
इज्जत के बदले इज्जत प्यार के बदले प्यार इसी नई सोच ने रिश्तों की पुरानी इमारतों को भी ढाया है।
गर्मियों में ननिहाल जाने की बाते हुए पुरानी अब तो समर वेकेशन में hill station ghumne ka jamana आया है।
कुछ हालात का शिकार हुए तो कुछ गलतफहमी की आंधी में उड़ गए ।
रिश्ते जो कभी कई थे अपने अपने रास्तों पर मुड गए। इसे नए फ़ैशन का दौर समझे या रिश्तों की टूटती हुई डोर।
अपने सब मतलबी हवा में बह गए और रिश्तों के बस कुछ नाम रह गए।
कोई पीठ पीछे प्यार से आपका नाम ले
यही है ज़िन्दगी भर की कमाई बाकी चीज़े तो मैं पहचान ही ना पाई।
जिन्होंने मुझे समझा उनके लिए अनमोल हो गई जो ना समझ पाए उनके लिए फ़िज़ूल कहलाई
बस यूंही मिले कुछ अनजान चेहरे ऐसे भी
जो है ज़रा खास कुछ ना होकर भी।
इन बेमतलब के रिश्तों में कुछ खास नहीं था
ना उम्मीद ना एहसास बस मुस्कुराहट का एक वादा था
वादा निभाते गए रिश्ते मजबूत होते गए।
मुस्कुराते मुस्कुराते कब मुस्कुराने की वजह बन गए
कुछ रिश्ते ऐसे मिले जो बेवजह हो कर भी सबा ( सुबह की हवा) बन गए।
सर्दियों की धूप और गर्मियों की प्यास जैसा है इन रिश्तों का एहसास
कुछ ना होकर भी है बहुत खास
सुना है नाम के रिश्तों की उम्र कम होती है।
इसी लिए कभी नहीं होने दूंगी इन्हे किसी नाम का मोहताज।