युद्ध मन का मस्तिष्क से हो या तन का तनिष्क (गहनों) से,
संयम रखने की सलाह हमेशा दी जाती है।
पर जब खुद को संयम रखना पड़े तो बात भारी हो जाती है।
तो क्यों ना आज इस संयम पर ही कुछ लिखा जाए, और धीर संयम धरने की बातों पर गोर किया जाए ।
मनुष्य इच्छाओं का एक पुंज(गुच्छा) है,
और इस पुंज का ही ये संसार निकुंज (जंगल) है।
निकुंज में प्रवाहित हो रही धारा की पतवार संयम,
आत्मा का सहज स्वभाव संयम,
भोग और योग के मध्य संयम,
आत्मा का परमात्मा से सानिध्य संयम,
संयम की ही दीवार रही दैत्यों और देवो के बीच,
संयम ही वो हल है जिस से चरित्र की भूमि को सींच
दमित और अदमित इच्छाओं का अंतिम द्वार है संयम,
भक्ति और मुक्ति का पहला पठार है संयम।
संयमी नयन कभी झुके नहीं संयमी कदम कभी रुके नहीं,
अंततः तुझे यू ही बह ते जाना है संयम का धर्म अपनाना है।
संयमी अश्व पर बैठ और कर इस निकुंज की सैर कभी
यहां कुछ तेरा नहीं कुछ मेरा नहीं सब बेगाना है।
आग में पानी सा है संयम ,कलह में बोली गई मीठी वाणी है संयम।
त्यागने योग्य इस संसार में धार्य (धारण करने योग्य)भाव है संयम।
आधुनिक युग में जिसका अभाव है वही है संयम।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बौद्ध सब धर्म की बात भी संयम ।
गीता बाइबल कुरान का सार ही संयम।
Awesome. ... It's true!
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