Tuesday, 22 October 2019

किन्नर की व्यथा

बनाने वाले ने मुझे भी क्या बनाया इतना रूप दिया
पर कुछ स्पष्ट नहीं समझाया।
मन दे कर नारी का नर सा शरीर बनाया ।
कैसी विचित्र रचना है ऊपरवाले ये  तेरी
इंसान का जन्म देकर  इंसान ही नहीं बनाया।

जब गलती तूने की है तो मै क्यों पछताऊं, कुछ तो सोचा ही होगा तूने तो  मै क्यों तेरी रचना पे सवाल उठाउ ।
इस  दोगले जीवन से कुछ ना मिला शिकायत कर।
मै खुश हूं लोगो की खुशियों में ताली बजा  कर।

कोई मुझे देख हंसता है तो कोई मेरे आशीर्वाद के लिए मरता है।
कभी देश में मेरे लिए बराबरी का दर्जा मांगा जाता है।
तो कभी मझे सड़कों पे सारे आम नोचा जाता है।
लेकिन तेरी इस दुनिया में मै गुमनाम होकर खुश हूं।
क्योंकि विश्वास लायक अब  ना तो नर बचे है ना नारी
बस बची है तो ये विचित्र सी जाति हमारी।

श्रृंगार नारी का कर नर जैसी आवाज बड़ी लुभाती है मुझे
तेरी इस करीगरी पर बहुत हंसी आती है मुझे
खैर इस मतलबी दुनिया में कोई तो दुआ देने वाला चाहिए।
जरूर ये ही ख्याल तेरे दिमाग में आया होगा,
और इसी लिए तूने नर -नारी के इस मिश्रित रूप को बनाया होगा।

खुद बे ओलाद है लेकिन कभी किसी की ओलाद को   बददुआ नहीं दी
तेरी  उत्कृष्ट कृति नर- नारी  जैसे नहीं जो बिना मतलब किसी से यारी नहीं कि।
अरे माना कोई परिवार नहीं है इस जीवन में हमारा
और ना ही हमें समाज ने अपनाया।
पर जरा कभी कह के तो दिखा किसका दिल दुखाया ।

ऐसी दाग भरी जिंदगी जीने से अच्छा में गुमनाम ही ठीक हूं।
अपने तन और मन के इस बेमेल योग से अनजान ही ठीक हूं।
कम से कम अकेली लड़की को हिम्मत तो दे सकता हूं।
किसी परेशान मां कि उलझन तो दूर कर सकता हूं।
अकेली  बहन को रात में उसके घर तो पहुंचा सकता हूं।

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